वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर निबंध
शिक्षा व संस्कार एक दूसरे के पूरक हैं । शिक्षा हमें संस्कारों को समझने और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप उसका अनुसरण करने की समझ देती है ।
शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो हमारे जीवन को नई विचारधारा देती है । ये हमें एक परिपक्व समाज बनाने में मदद करती है , यदि शिक्षा का उद्देश्य सही दिशा में हो तो ये इंसान को नए प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करती है । यदि शिक्षा हमारे उद्देश्यों को पूरा नहीं करती तो , ऐसी शिक्षा का कोई मतलब नहीं है , उसमें आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है ।
सन् 1858 में Indian Education Act बनाया गया था , आज हमारी शिक्षा व्यवस्था इसी कानून पर आधारित है जो लार्ड मैकाले की देन है । भारतीयता को नष्ट कर उसे अंग्रेजियत का जामा पहनाकर हमारी संस्कृति को नेस्तनाबूद करने की जो कुत्सित भावना थी वह आज साकार हो चली है।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली के दोष :-
वर्तमान शिक्षा प्रणाली के व्यापारीकरण , व्यवसायीकरण , और निजीकरण ने शिक्षा के क्षेत्र को पूरी तरह अपनी जकड़ में ले लिया है । इस बाजार में शिक्षा क्रय - विक्रय की वस्तु बनती जा रही है , जिसे बाजार में निश्चित शुल्क से अधिक धन देकर खरीदा जा सकता है । सामाजिक असंतुलन और विषमता इसका ही दुष्परिणाम है । सामाजिक विज्ञान और मानविकी विषयों की उपेक्षा करना देश की उन्नति के लिए हानिकारक है । पारंपरिक ज्ञान की अवहेलना देश के लिए खतरनाक है ।निराकरण :-
शिक्षा पर मुनाफा कमाने पर रोक , धनवान तथा आर्थिक दृष्टि से पिछड़े सभी छात्रों के लिए अच्छी शिक्षा दिलाने का संकल्प , शिक्षा , इन सभी बातों को स्वीकार करे यह अत्यावश्यक है । शिक्षा को राजनीति की दासता से मुक्त करना अनिवार्य है । शिक्षा बाजार नहीं मानव - मन को तैयार करने का उदात्त साँचा है । जितनी जल्दी हम इस बात को समझेंगे उतना ही शिक्षा का भला होगा ।गाँधीजी ने शिक्षा के उद्देश्य का सरलीकरण करते हुए कहा था कि , " The aim at education is development at Head , Heart and Hand . " अर्थात् दिल , दिमाग और हाथ की शिक्षा ।
दुर्भाग्य यह परिभाषा आज हमारी सोच को एकांकी बना रही है । वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने हमारी बौद्धिकलब्धि को ही बढ़ावा दिया है । बौद्धिकता व्यक्ति को अहमवादी और तर्कशील बनाती है।
हमारा मस्तिष्क बायें भाग से काम करता है । डेनियल गोलमेन के अनुसार भावना बौद्धिकलब्धि की सहचरी है , अतः कहा गया है कि , ' Start from the left and go to the right . '
आज मस्तिष्क के दोनों भागों की सक्रिय बनाने की आवश्यकता है । भावनाओं को संतुलित रखना और सामाजिक दक्षता के स्तर तक पहुँचाने के लिए आध्यात्मिकता को अपनाना होगा ।
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उपसंहार :-
प्राचीन भारत ने ज्ञान - विज्ञान के क्षेत्र में जो विश्व को देन दी है उसे वर्तमान शिक्षा प्रणाली का आधार बनाना होगा । समझना होगा कि ' स्वस्थ बीज ही स्वस्थ पौधे को जन्म देता है । मैकाले की कुत्सित सोच के नागपाश से हमें वर्तमान शिक्षा प्रणाली को मुक्त करना होगा इसके लिए शिक्षाविदों , मनीसियों और युवाओं को आगे आना होगा , आने वाली पीढ़ी के समग्र पतन के लिए उत्तरदायी होंगे ।बौद्धिकता , भावनात्मकता तथा आध्यात्मिकता इन उपलब्धियों के परिणामस्वरूप ही हम शिक्षा तथा जीवन के लक्ष्य तक पहुँच पाएँगे अन्यथा नहीं । वर्तमान शिक्षा प्रणाली में यह बदलाव अनिवार्य हो गया है । यदि सही कदम ना उठाए गए तो पश्चाताप के अवसर भी प्राप्त नहीं होंगे । आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा के महत्व को हम समझे और यह माने के "भावना और क्रिया के संगम पर ही शिक्षा तीर्थराज - प्रयाग बनती है ।"
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